तीन स्थितियाँ
गिरफ़्तारी का डर है, पर अभी हुई नहीं। उपाय है अग्रिम ज़मानत — BNSS की धारा 482 (पहले CrPC की धारा 438) — सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट में अर्ज़ी। अदालत से निर्देश माँगा जाता है कि अगर गिरफ़्तारी हो, तो व्यक्ति को ज़मानत पर छोड़ दिया जाए। पहली सुनवाई पर अक्सर अंतरिम सुरक्षा माँगी जाती है।
गिरफ़्तारी हो चुकी है। उपाय है रेगुलर ज़मानत। ग़ैर-ज़मानती अपराध में मजिस्ट्रेट धारा 480 BNSS (पहले 437 CrPC) के तहत फ़ैसला करता है; सेशन कोर्ट और हाई कोर्ट के पास धारा 483 BNSS (पहले 439 CrPC) के तहत व्यापक अधिकार हैं। ज़मानती अपराध में ज़मानत धारा 478 BNSS (पहले 436) के तहत अधिकार है।
किसी ख़ास वजह से थोड़े समय की रिहाई चाहिए — इलाज, परिवार में मृत्यु, परीक्षा — तो अदालत शर्तों के साथ तय अवधि की अंतरिम ज़मानत दे सकती है।
इसके अलावा डिफ़ॉल्ट ज़मानत है — धारा 187(3) BNSS (पहले 167(2) CrPC): अगर पहली रिमांड से 60 या 90 दिन (अपराध के अनुसार) में चार्जशीट दाख़िल नहीं होती, तो अर्ज़ी देने पर आरोपी ज़मानत का हक़दार हो जाता है। और धारा 479 BNSS (पहले 436A) के तहत विचाराधीन क़ैदी की रिहाई, जब अधिकतम सज़ा का निर्धारित हिस्सा हिरासत में बीत चुका हो।
अदालत क्या देखती है
नियम ज़मानत है, जेल अपवाद — लेकिन अदालत का विवेक असली है। अदालत देखती है: आरोप की प्रकृति और गंभीरता, सज़ा कितनी कड़ी है, अब तक जुटे सबूत, आरोपी की भूमिका, भागने, सबूत से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित करने का ख़तरा, पुराना आपराधिक रिकॉर्ड, और जाँच किस स्टेज पर है। आर्थिक अपराधों और विशेष क़ानूनों (NDPS, PMLA, POCSO, UAPA) में क़ानून ख़ुद कड़ी शर्तें लगाता है, जिनका जवाब अर्ज़ी में देना पड़ता है।
सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों में सुप्रीम कोर्ट के अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) के निर्देश — जो अब धारा 35 BNSS में शामिल हैं — पुलिस से गिरफ़्तारी का कारण दर्ज करने और आम तौर पर गिरफ़्तारी की जगह पेश होने का नोटिस देने की अपेक्षा करते हैं। यह प्रक्रिया अपनाई गई या नहीं, यह ज़मानत की सुनवाई में अक्सर पहला मुद्दा होता है। सतेंदर कुमार अंतिल बनाम CBI (2022) के दिशानिर्देश भी उतने ही अहम हैं।
चैंबर ज़मानत का मामला कैसे संभालता है
- FIR, लगाई गई धाराओं, जाँच की स्टेज और थाने का तुरंत आकलन; अगर व्यक्ति हिरासत में है, तो रिमांड के काग़ज़ और अगली पेशी की तारीख़।
- फ़ोरम और समय का चुनाव — सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट; पहले अंतरिम सुरक्षा लेनी है या नहीं; धारा 35 BNSS के तहत जाँच अधिकारी से पेश होने के नोटिस की बात करनी है या नहीं।
- ऐसी अर्ज़ी की ड्राफ़्टिंग जो अभियोजन की हर आशंका का जवाब दे — समाज में जड़ें, रोज़गार, मेडिकल रिकॉर्ड, जाँच में सहयोग, पुराने आदेश — सबूतों के साथ।
- सुनवाई, जिसमें स्टेटस रिपोर्ट का जवाब और प्रस्तावित शर्तें शामिल हैं।
- अनुपालन — ज़मानती, बॉन्ड, पासपोर्ट जमा करना, हाज़िरी की शर्तें — और ज़मानत ख़ारिज होने पर ऊपरी अदालत में अपील या नई अर्ज़ी।
चैंबर शिकायतकर्ताओं और पीड़ितों की ओर से ज़मानत का विरोध भी करता है।
दिल्ली की अदालतें
दिल्ली में ज़मानत की अर्ज़ियाँ थाने के अनुसार तीस हज़ारी, साकेत, पटियाला हाउस, कड़कड़डूमा, रोहिणी और द्वारका की मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट और सेशन अदालतों में, और शेर शाह रोड स्थित दिल्ली हाई कोर्ट में सुनी जाती हैं। दिल्ली में अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी आम तौर पर पहले सेशन कोर्ट में दी जाती है।
कौन से दस्तावेज़ तैयार रखें
- FIR की कॉपी (ज़्यादातर अपराधों में दिल्ली पुलिस की वेबसाइट से डाउनलोड हो जाती है) या शिकायत
- पुलिस से मिला कोई नोटिस, और अगर आप पेश हुए तो उसका सबूत
- पहचान और पते का प्रमाण; नौकरी या कारोबार के दस्तावेज़
- अगर स्वास्थ्य आधार है तो मेडिकल काग़ज़
- इसी केस में पहले की अर्ज़ियाँ और आदेश
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
दिल्ली में अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी कितनी जल्दी दाख़िल हो सकती है?
FIR की कॉपी और बुनियादी दस्तावेज़ मिलते ही एक दिन में अर्ज़ी तैयार और दाख़िल हो सकती है; सेशन कोर्ट में आम तौर पर कुछ दिनों में सूचीबद्ध होती है, और गिरफ़्तारी नज़दीक हो तो अर्जेंट मेंशनिंग हो सकती है। अंतरिम सुरक्षा पर अक्सर पहली सुनवाई में बहस होती है।
क्या अग्रिम ज़मानत ट्रायल के अंत तक चलती है?
सुप्रीम कोर्ट ने सुशीला अग्रवाल बनाम राज्य (NCT दिल्ली) (2020) में कहा कि अग्रिम ज़मानत अपने आप किसी तय अवधि तक सीमित नहीं है और ट्रायल के अंत तक चल सकती है, हालाँकि अदालत किसी ख़ास मामले में शर्तें लगा सकती है या अवधि सीमित कर सकती है।
डिफ़ॉल्ट ज़मानत क्या है?
अगर पुलिस पहली रिमांड से 60 दिन (या मृत्युदंड, आजीवन कारावास या दस साल से अधिक सज़ा वाले अपराधों में 90 दिन) में चार्जशीट दाख़िल नहीं करती, तो धारा 187(3) BNSS के तहत आरोपी को ज़मानत का अटल अधिकार मिल जाता है — बशर्ते अर्ज़ी चार्जशीट दाख़िल होने से पहले दी जाए।
क्या ज़मानत रद्द हो सकती है?
हाँ। जिस अदालत ने ज़मानत दी, या ऊपरी अदालत, शर्तों के उल्लंघन, गवाहों को धमकाने या ज़मानत पर रहते हुए वैसा ही अपराध करने पर ज़मानत रद्द कर सकती है। इसलिए शर्तों का पालन गंभीरता से किया जाता है।
क्या NDPS, PMLA या POCSO मामलों में ज़मानत मिलती है?
मुश्किल होती है, क्योंकि इन क़ानूनों में अतिरिक्त शर्तें हैं (जैसे NDPS की धारा 37 और PMLA की धारा 45 की “दोहरी शर्तें”), लेकिन जहाँ सामग्री क़ानूनी सीमा पूरी नहीं करती, मेडिकल आधार पर, या ट्रायल में देरी के आधार पर ज़मानत मिलती है।
इस मामले में बात करनी है?
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