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Bar Council of Delhi · D/2658/2015 English

Criminal

FIR और आपराधिक कार्यवाही की क्वैशिंग

हर FIR ट्रायल की हक़दार नहीं होती। दिल्ली हाई कोर्ट FIR, चार्जशीट या शिकायत मामले को रद्द कर सकता है जहाँ कोई अपराध बनता ही नहीं, विवाद असल में सिविल है, पक्षों में समझौता हो गया है, या मुक़दमा अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

अधिकार

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 हाई कोर्ट की अंतर्निहित शक्ति (पहले धारा 482 CrPC) को बनाए रखती है — किसी भी अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने और न्याय सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी आदेश देना। इस धारा के तहत याचिका — आम तौर पर संविधान के अनुच्छेद 226 या 227 के साथ — दिल्ली में FIR, चार्जशीट, समन आदेश या पूरे शिकायत मामले को रद्द कराने का रास्ता है।

किन आधारों पर FIR रद्द होती है

सुप्रीम कोर्ट के हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल (1992) की श्रेणियाँ आज भी ढाँचा हैं:

  • आरोप, जैसे के तैसे मान लेने पर भी, कोई अपराध नहीं बताते;
  • आरोप बेतुके या स्वाभाविक रूप से असंभव हैं;
  • कार्यवाही पर कोई कानूनी रोक है (जैसे मंज़ूरी का अभाव या समय-सीमा);
  • कार्यवाही स्पष्ट रूप से दुर्भावना से या बदला लेने के लिए शुरू की गई है;
  • विवाद पूरी तरह सिविल या व्यावसायिक प्रकृति का है — अनुबंध का उल्लंघन, प्रॉपर्टी का झगड़ा, पैसे की वसूली — जिसे आपराधिक रंग दिया गया है।

इसके अलावा, जहाँ अपराध मूलतः निजी प्रकृति का है और पक्षों में समझौता हो गया है, हाई कोर्ट ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य (2012) और नरिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य (2014) के सिद्धांतों पर ग़ैर-शमनीय अपराधों में भी कार्यवाही रद्द कर सकता है। वैवाहिक विवाद, चेक बाउंस, पड़ोसियों के झगड़े और व्यावसायिक मतभेदों में यह आम है। जघन्य अपराधों या समाज के विरुद्ध अपराधों में यह उपलब्ध नहीं है।

याचिका में क्या होता है

  1. FIR और रिकॉर्ड का विश्लेषण — हर अपराध का हर तत्व आरोपित है या नहीं; चार्जशीट कुछ जोड़ती है या नहीं; शिकायत किसी सिविल मुक़दमे या वसूली नोटिस का जवाबी हमला तो नहीं।
  2. आधार और दस्तावेज़ — समझौते, पत्राचार, खाता-बही, पुराना मुक़दमा, समझौता विलेख, या ऐसा रिकॉर्ड जो आरोप को असंभव दिखाए।
  3. दिल्ली हाई कोर्ट में दाख़िला, ज़रूरी संलग्नकों के साथ; समझौते के मामलों में शिकायतकर्ता के शपथपत्र और समझौते की शर्तें।
  4. अंतरिम राहत — याचिका लंबित रहने तक जाँच या ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक, या कठोर कार्रवाई से सुरक्षा।
  5. सुनवाई, जिसमें राज्य की स्टेटस रिपोर्ट और समझौते के मामलों में शिकायतकर्ता की उपस्थिति शामिल है।

संबंधित उपाय

  • ट्रायल कोर्ट में आरोप की स्टेज पर डिस्चार्ज (धारा 250 और 262 BNSS, पहले 227 और 239 CrPC), जहाँ सामग्री प्रथम दृष्टया केस नहीं बनाती।
  • समन आदेश या आरोप तय करने के आदेश के विरुद्ध रिवीज़न
  • शमनीय अपराधों का ट्रायल कोर्ट में धारा 359 BNSS (पहले 320 CrPC) के तहत शमन (compounding)
  • पुलिस के क्लोज़र रिपोर्ट दाख़िल करने पर प्रोटेस्ट पिटीशन

कौन से दस्तावेज़ तैयार रखें

  • FIR या शिकायत की कॉपी, चार्जशीट (अगर दाख़िल हुई हो), ट्रायल कोर्ट के सभी आदेश
  • विवाद की असली प्रकृति दिखाने वाले दस्तावेज़ — समझौते, इनवॉइस, पत्राचार, सिविल मुक़दमे के काग़ज़
  • अगर समझौता हुआ है तो समझौता विलेख या MoU
  • पहचान दस्तावेज़ और, समझौते के मामलों में, शिकायतकर्ता के संपर्क विवरण

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या चार्जशीट से पहले FIR रद्द हो सकती है?

हाँ। हाई कोर्ट किसी भी स्टेज पर — दर्ज होने के तुरंत बाद भी — FIR रद्द कर सकता है जहाँ FIR अपने ही कथन पर कोई अपराध नहीं बताती या प्रक्रिया का दुरुपयोग है। अन्य मामलों में अदालत जाँच पूरी होने देना और चार्जशीट के आधार पर फ़ैसला करना पसंद कर सकती है।

क्या 498A या वैवाहिक FIR समझौते पर रद्द हो सकती है?

आम तौर पर हाँ। वैवाहिक अपराध निजी प्रकृति के माने जाते हैं और दिल्ली हाई कोर्ट ऐसी FIR नियमित रूप से रद्द करता है जहाँ पक्षों में वास्तविक समझौता हो गया हो — आम तौर पर आपसी सहमति से तलाक़ और सभी मुक़दमों की वापसी के साथ — शिकायतकर्ता द्वारा व्यक्तिगत रूप से समझौते की पुष्टि के बाद।

दिल्ली हाई कोर्ट में क्वैशिंग याचिका में कितना समय लगता है?

समझौते पर आधारित याचिका अक्सर दाख़िल होने के कुछ हफ़्तों में निपट जाती है, सूचीबद्ध होने के अधीन। गुण-दोष पर लड़ी जाने वाली याचिकाओं में अधिक समय लगता है, और बीच में अंतरिम सुरक्षा माँगी जाती है।

क्या क्वैशिंग याचिका दाख़िल करने से ट्रायल रुक जाता है?

अपने आप नहीं। कार्यवाही या कठोर कार्रवाई पर रोक विशेष रूप से माँगनी और मिलनी चाहिए; वरना ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही साथ-साथ चलती रहती है।

अगर शिकायतकर्ता समझौता न करे तो?

तब याचिका गुण-दोष पर चलती है — अपराध न बनना, विवाद की सिविल प्रकृति, देरी, दुर्भावना या कानूनी रोक। विकल्प के तौर पर ट्रायल कोर्ट में डिस्चार्ज की स्टेज उपयुक्त हो सकती है।

इस मामले में बात करनी है?

कॉल या WhatsApp करें, या संक्षिप्त विवरण ऑनलाइन भेजें। परामर्श चैंबर में या वीडियो पर — दस्तावेज़ों के साथ।

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यह पेज सामान्य जानकारी के लिए है, कानूनी सलाह नहीं। अंतिम अपडेट: 2026-09-22